Abstract
अग्नि पुराण में यज्ञ विद्या का वर्णन एक समग्र, बहुआयामी और जीवन-केन्द्रित दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। यह पुराण भारतीय जीवन का विश्वकोष माना जाता है, जिसमें सृष्टि-प्रलय, मन्वन्तर, राजवंश, देव-महात्म्य के साथ-साथ दैनिक व्यवहार, सामाजिक व्यवस्था एवं आध्यात्मिक साधना के सूक्ष्म नियम संग्रहीत हैं। यज्ञ को मात्र कर्मकाण्ड या देव-आराधना तक सीमित न रखकर, इसे ब्रह्माण्डीय शक्तियों के साथ संनादित, आत्म-शुद्धि, सामाजिक संतुलन एवं भोग-मोक्ष दोनों की प्राप्ति का साधन माना गया है। पुराण के विभिन्न अध्यायों (11, 13, 30, 31, 32, 33, 107, 108, 162 आदि) में यज्ञ के विविध पक्षों का वर्णन मिलता है—विष्णु एवं शिव की सामान्य पूजा में समस्त परिवार, शक्तियों, आयुधों, दिक्पालों एवं तत्त्वों का यजन; कुण्ड-निर्माण की वैज्ञानिक विधि (चतुरस्र, वर्तुल, अर्धचन्द्र, पद्माकृति, मेखला, योनि, कण्ठ, सुषिर आदि); देवता-प्रतिष्ठा, समुदाय-प्रतिष्ठा, गृह-स्थापना एवं जीर्णोद्धार में सामाजिक-सांस्कृतिक निरन्तरता; उत्सव-विधि में मङ्गलाङ्कुर, तीर्थयात्रा, रथयात्रा एवं सामूहिक अनुष्ठान; गणपूजा एवं त्रिपुरा-यजन में विघ्न-नाश एवं सिद्धि-प्राप्ति; यज्ञावधान में विभिन्न कामनाओं (शान्ति, पुष्टि, स्वास्थ्य, विजय, धन, सौभाग्य, संतान, आयु, बाधा-निवारण) के लिए विशिष्ट समिधा, हवि, मन्त्र एवं द्रव्य-संयोजन। यज्ञ को यहाँ केवल बाह्य अग्नि-हवन नहीं, अपितु आन्तरिक कल्मष-दहन, चेतना-शुद्धि एवं प्रकृति-संनाद का माध्यम माना गया है। यह जीवन-विज्ञान की एक सुव्यवस्थित प्रणाली है, जो लौकिक कल्याण एवं आध्यात्मिक उन्नति के मध्य सेतु का कार्य करती है। वर्तमान संदर्भ में भी इसकी प्रासंगिकता बनी रहती है, विशेषकर स्वास्थ्य, पर्यावरण संतुलन एवं सामाजिक एकता के क्षेत्र में।
References
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